
नागपुर: कोरोना महामारी की वो भयानक दूसरी लहर भला कौन भूल सकता है, जब देश में ऑक्सीजन की एक-एक सांस के लिए हाहाकार मचा हुआ था। मरीजों की जान बचाने के लिए सरकार ने आनन-फानन में करोड़ों रुपये खर्च कर ऑक्सीजन प्लांट खड़े कर दिए थे। लेकिन आज की कड़वी सच्चाई आपको हैरान कर देगी। महामारी खत्म होते ही करोड़ों की लागत से बने ये जीवनदायी ‘PSA’ ऑक्सीजन प्लांट अब बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं।
लाखों का मेंटेनेंस खर्च, लेकिन इस्तेमाल ‘शून्य’
नागपुर से आई इस चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान शहर में ऑक्सीजन की मांग रिकॉर्ड 178 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी। भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने भारी-भरकम बजट आवंटित कर मेयो, मेडिकल, एम्स और मनपा अस्पतालों को मिलाकर कुल 11 प्रेशर स्विंग एड्सॉर्प्शन (PSA) ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए थे।
लेकिन आज स्थिति यह है कि कोरोना संकट टलते ही इन प्लांट्स की सुध लेने वाला कोई नहीं है। लाखों रुपये के रखरखाव (Maintenance) वाले ये प्लांट अब पूरी तरह निष्क्रिय होने की कगार पर हैं, जिससे जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
महीने में सिर्फ 2 दिन ही खुलते हैं ताले!
आखिर ये प्लांट बंद क्यों पड़े हैं? इसका कारण भी बेहद चौंकाने वाला है। अधिकारियों के मुताबिक, अगर इन प्लांट्स को लगातार चालू रखा जाए, तो हर महीने 2 से 3 लाख रुपये का सिर्फ बिजली का बिल आएगा।
इस भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए प्रशासन इन प्लांट्स को बंद रखता है। मशीनें पूरी तरह खराब न हो जाएं, यह सुनिश्चित करने के लिए महीने में केवल एक या दो बार ही मॉक ड्रिल के तौर पर इन्हें लगभग 18 घंटे के लिए चलाया जाता है।
ICU मरीजों के लिए क्यों नाकाफी साबित हुए ये प्लांट?
रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती दिनों में इन प्लांट्स से मिलने वाली ऑक्सीजन का इस्तेमाल सामान्य वार्ड के मरीजों के लिए किया गया था। लेकिन, आईसीयू (ICU) में भर्ती गंभीर मरीजों के लिए जिस उच्च दबाव (High Pressure) और अत्यधिक शुद्धता वाली ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, वह इन PSA प्लांट्स से पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाती। यही वजह है कि सरकारी अस्पतालों में होने के बावजूद इनका इस्तेमाल बेहद सीमित हो गया है।
भविष्य में अगर कोई तीसरी महामारी या स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति पैदा होती है, तो क्या ये प्लांट समय पर काम आ पाएंगे? बिना नियमित इस्तेमाल के इन करोड़ों की मशीनों की कार्यक्षमता को बनाए रखना अब प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है।
