
5500 वर्षों का जीवंत इतिहास: जहां आज भी वास करते हैं श्री कृष्ण और राधा रानी
मथुरा/बरसाना:
ब्रज भूमि का कण-कण भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की लीलाओं का गवाह है। करीब साढ़े पांच हजार (5,500) वर्ष पुराना इतिहास समेटे मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव आज भी आस्था और चमत्कारों का ऐसा केंद्र हैं, जिसे विज्ञान भी सलाम करता है। मान्यता है कि आज कलयुग में भी इस पावन धरा पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी अदृश्य रूप में विहार करते हैं।
निधिवन का रहस्य: रात होते ही गोपियां बन जाते हैं तुलसी के पौधे
वृंदावन का निधिवन दुनिया के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। यहां 24 घंटे तुलसी के अनूठे वृक्ष मौजूद रहते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि ये पेड़ नीचे की ओर झुके हुए और आपस में गुंथे हुए हैं।
पौराणिक मान्यता: रात होते ही निधिवन के ये तुलसी के पौधे गोपियों का रूप धारण कर लेते हैं और साक्षात श्री कृष्ण के साथ रासलीला रचाते हैं। यही कारण है कि शाम की आरती के बाद इस वन में मनुष्यों तो क्या, पशु-पक्षियों को भी रहने की इजाजत नहीं होती। इसी पावन स्थल पर चैतन्य महाप्रभु ने भी कठिन तपस्या की थी, जिससे यह कलयुग का सबसे जाग्रत तुलसी वन माना जाता है।
बरसाना और गोवर्धन पर्वत: 21 किलोमीटर की आस्था और लठमार होली
मथुरा से करीब 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बरसाना अपनी विश्वप्रसिद्ध ‘लठमार होली’ के लिए जाना जाता है। यहीं से शुरू होता है पूजनीय गोवर्धन पर्वत का मार्ग, जिसकी 21 किलोमीटर की परिक्रमा में श्रद्धालुओं को अनेक प्राचीन मंदिर, पवित्र कुंड और दिव्य झांकियों के दर्शन होते हैं।
- इंद्र का अहंकार और गोवर्धन लीला: धार्मिक इतिहास के अनुसार, जब इंद्र देवता ने ब्रज पर अपना प्रकोप दिखाते हुए लगातार भारी वर्षा की थी, तब श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया था और सभी को आश्रय दिया था।
नंदगांव: जहां 9 वर्ष 49 दिन रहे कान्हा, आज भी मौजूद हैं सैकड़ों गायें
नंदगांव की पहाड़ी का भी अपना एक विशेष ऐतिहासिक महत्व है। इसी पावन पहाड़ी पर भगवान श्री कृष्ण और बलराम अपने माता-पिता वासुदेव और यशोदा मैया के साथ 9 वर्ष और 49 दिन रहे थे। यहां कान्हा ने अपनी बालपन की अनेक लीलाएं रचीं।
- नंदेश्वर महादेव का रहस्य: पौराणिक कथाओं के अनुसार, बाल कृष्ण के अनुपम रूप के दर्शन के लिए स्वयं भगवान शिव व्याकुल होकर यहां आए थे। माता यशोदा ने जब उन्हें कान्हा के दर्शन कराए, तो शिव जी यहीं स्थापित हो गए, जिन्हें आज ‘नंदेश्वर महादेव’ के रूप में पूजा जाता है। नंदबाबा की विरासत को संभालते हुए आज भी यहां सैकड़ों गायें देखने को मिलती हैं, जो द्वापर युग की याद दिलाती हैं।
विशेष रिपोर्ट: सतीश पारधी, न्यूज़ भारत
